नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन का प्रहार अब हिमालय की चोटियों पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) द्वारा जारी नवीनतम सैटेलाइट आंकड़ों ने दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र में इस साल पिछले दो दशकों यानी 23 वर्षों में सबसे कम बर्फबारी दर्ज की गई है। यह डेटा न केवल पर्यावरणविदों के लिए एक चेतावनी है, बल्कि उन करोड़ों लोगों के अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा करता है जिनकी प्यास और खेती इन पहाड़ों से निकलने वाली नदियों पर टिकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि स्नो-लाइन (बर्फ की रेखा) ऊपर खिसक रही है, जिससे कभी सफेद चादर से ढकी रहने वाली चोटियां अब नग्न और पथरीली नजर आने लगी हैं।
The International Panel on Climate Change (IPCC) had already predicted this shift, noting that rising global temperatures are drastically shortening the snowfall window. हिंदू-कुश हिमालय को 'एशिया का वॉटर टावर' कहा जाता है क्योंकि यह गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी 10 बड़ी नदियों का उद्गम स्थल है। कम बर्फबारी का सीधा मतलब है ग्लेशियरों का पुनर्भरण (Recharge) न होना। जब सर्दियों में पर्याप्त बर्फ नहीं गिरती, तो गर्मियों में नदियों का प्रवाह कम हो जाता है, जिससे मैदानी इलाकों में सूखे की स्थिति पैदा होती है। इसके विपरीत, अचानक तापमान बढ़ने से बची-खुची बर्फ तेजी से पिघलती है, जो विनाशकारी बाढ़ (Flash Floods) का कारण बनती है। यह असंतुलन पूरे दक्षिण एशिया की खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह करने की क्षमता रखता है।
The year 2026 is witnessing an unprecedented decline in the 'Snow Persistence' levels across the HKH region, spanning from Afghanistan to Myanmar. पहाड़ों पर कम बर्फ का असर केवल नदियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय पर्यटन, सेब की बागवानी और बिजली उत्पादन (Hydropower) को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। ICIMOD के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग पर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई, तो सदी के अंत तक हिमालय के एक-तिहाई ग्लेशियर गायब हो सकते हैं। यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं को एक स्पष्ट संदेश देती है कि जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया है।