भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की सुगबुगाहट तेज: विदेश मंत्री जयशंकर और अमेरिकी सीनेटर स्टीव डैनिस के बीच रणनीतिक वार्ता

 



नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के उद्देश्य से रविवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी सांसद (सीनेटर) स्टीव डैनिस के बीच नई दिल्ली में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुलाकात हुई। इस बैठक के बाद विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर तस्वीरें साझा करते हुए बताया कि दोनों नेताओं के बीच भारत-अमेरिका संबंधों के रणनीतिक महत्व और भविष्य की कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा हुई है। This high-level meeting is being viewed as a precursor to a potential breakthrough in trade negotiations, signaling a deepening of the strategic bond between the two nations. जयशंकर ने इससे पहले अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो से भी रक्षा, परमाणु ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग को लेकर टेलीफोन पर गहन वार्ता की थी।

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के हालिया बयानों ने भी इन चर्चाओं को और बल दिया है, जिसमें उन्होंने भारत को अमेरिका का 'सबसे महत्वपूर्ण साझेदार' बताया था। राजदूत गोर ने संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता का अगला दौर आगामी मंगलवार को होने वाला है। Despite the complexities involved in reaching a final agreement with the world’s most populous nation, U.S. officials expressed a firm commitment to resolving differences and finalising the trade deal. अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि न केवल व्यापार, बल्कि सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, ऊर्जा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों का आपसी तालमेल वैश्विक स्थिरता के लिए अनिवार्य है।

कूटनीतिक गलियारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत मित्रता को इस रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है। राजदूत गोर ने स्पष्ट किया कि दोनों नेताओं के बीच 'सच्ची दोस्ती' है, जो केवल हितों पर नहीं बल्कि उच्च स्तर के आपसी सम्मान और विश्वास पर टिकी है। As both countries prepare for the upcoming Tuesday talks, the focus remains on transforming this strategic partnership into a comprehensive economic alliance that benefits both economies. इस वार्ता की सफलता न केवल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगी, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को भी नई मजबूती प्रदान करेगी।



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