मुंबई: बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के आगामी मेयर चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने नियमों में एक ऐसा बदलाव किया है, जिसने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह पलट दिया है। देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) के नेतृत्व वाली सरकार ने 'पीठासीन अधिकारी' (Presiding Officer) की नियुक्ति के पुराने नियमों को संशोधित करते हुए अब इस प्रक्रिया की कमान प्रशासनिक अधिकारियों को सौंप दी है। नई अधिसूचना के अनुसार, मेयर चुनाव के दौरान सदन की अध्यक्षता अब नगर आयुक्त या सचिव स्तर का अधिकारी करेगा। इस कदम को शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की उस रणनीति पर सीधा प्रहार माना जा रहा है, जिसके तहत वे तकनीकी आधार पर मेयर पद हासिल करने की योजना बना रहे थे।
अब तक की परंपरा के अनुसार, नए मेयर के चुनाव तक सदन की कार्यवाही निवर्तमान महापौर या सबसे वरिष्ठ नगरसेवक द्वारा संचालित की जाती थी। चूंकि बीएमसी का कार्यकाल खत्म हुए लगभग तीन साल हो चुके हैं, ऐसे में पुराने नियमों के आधार पर उद्धव गुट की वरिष्ठ पार्षद श्रद्धा जाधव को पीठासीन अधिकारी बनने का अवसर मिल सकता था। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विपक्ष का पीठासीन अधिकारी होता, तो वह मतदान प्रक्रिया या तकनीकी आपत्तियों के दौरान सत्ताधारी गठबंधन के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता था। अब वर्तमान नगर आयुक्त भूषण गगराणी, जो प्रधान सचिव स्तर के अधिकारी हैं, इस पूरी प्रक्रिया का संचालन करेंगे। This strategic administrative tweak by the state government effectively neutralizes the opposition's potential tactical advantage in the mayoral polls.
हाल ही में संपन्न हुए बीएमसी चुनाव 2026 (BMC Election Results 2026) में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि महायुति गठबंधन बहुमत के आंकड़े के करीब है। नए नियमों ने न केवल पीठासीन अधिकारी की शक्ति को बदला है, बल्कि नवनिर्वाचित मेयर के अधिकारों को भी सीमित कर दिया है अब नया मेयर उपमहापौर के चुनाव के दौरान अध्यक्षता नहीं कर सकेगा। विपक्ष ने इस बदलाव को 'लोकतंत्र की हत्या' करार देते हुए इसे सत्ता का दुरुपयोग बताया है। आने वाले दिनों में मुंबई महापौर चुनाव (Mumbai Mayor Election Schedule 2026) के दौरान सदन में भारी हंगामे के आसार हैं, क्योंकि ठाकरे गुट इस अधिसूचना को कानूनी चुनौती देने पर विचार कर रहा है। The conflict underscores the high stakes involved in controlling India's richest civic body, where every procedural rule has become a battlefield for political dominance.