नई दिल्ली: दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में सुरक्षा समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, जहाँ पाकिस्तान और चीन अपनी रॉकेट व मिसाइल क्षमताओं को आधुनिक बनाने में जुटे हैं। SIPRI 2025 और पेंटागन की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स (PLARF) और पाकिस्तान की नवनिर्मित आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड (ARFC) भारत के लिए एक गंभीर 'टू-फ्रंट वॉर' (दो-मोर्चे के युद्ध) की चुनौती पेश कर रही हैं। पाकिस्तान ने अगस्त 2025 में चीन की तर्ज पर अपनी मिसाइल फोर्स का गठन किया है, जो मुख्य रूप से 'फतह' सीरीज की मिसाइलों के जरिए सटीक और सघन हमलों (Saturation Attacks) पर ध्यान केंद्रित कर रही है। चीन का समर्थन पाकिस्तान को वह तकनीक प्रदान कर रहा है, जिससे वह कम दूरी के पारंपरिक संघर्षों में भी भारत की रक्षा प्रणाली को ओवरलोड करने की क्षमता विकसित कर रहा है।
While Pakistan's ARFC poses a tactical threat with its Fatah-4 and Fatah-5 missiles, China's PLARF remains a global heavyweight with over 1,250 ground-based ballistic missiles and advanced hypersonic technology like the DF-17. चीन के पास वर्तमान में 600 से अधिक परमाणु वॉरहेड हैं, जिनके 2030 तक 1,000 के पार पहुँचने का अनुमान है। भारत की तुलना में चीन की मिसाइल संख्या और हाइपरसोनिक मारक क्षमता काफी अधिक है, जो भारत के हवाई सुरक्षा कवच जैसे S-400 को भी चुनौती दे सकती है। दूसरी ओर, भारत ने भी अपनी 'अग्नि-5' (MIRV क्षमता वाली) और 'प्रलय' मिसाइलों के साथ अपनी प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) को मजबूत किया है। SIPRI 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत के पास लगभग 180 परमाणु वॉरहेड हैं, और भारतीय सेना अब स्वयं की एक एकीकृत रॉकेट फोर्स बनाने की दिशा में तेजी से कदम उठा रही है।
The 2025 border skirmishes between India and Pakistan have highlighted the urgent need for India to accelerate its indigenous missile programs and expand its air defense systems. सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की फतह सीरीज की बढ़ती रेंज और चीन की तिब्बत में मिसाइल तैनाती भारत के उत्तरी और पश्चिमी कमानों के लिए निरंतर तनाव का कारण बनी रहेगी। चीन-पाकिस्तान का रक्षा सहयोग न केवल मिसाइल आपूर्ति तक सीमित है, बल्कि इसमें स्पेस-बेस्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और सैटेलाइट गाइडेंस भी शामिल है। भारत के लिए आगामी वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती इन दोनों देशों के 'सैचुरेशन अटैक' से निपटने के लिए एक अभेद्य मल्टी-लेयर्ड मिसाइल डिफेंस शील्ड और हाइपरसोनिक प्रहारक क्षमता विकसित करना होगा।