चंडीगढ़: पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार और मीडिया समूह 'पंजाब केसरी' के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। बुधवार देर रात पंजाब पुलिस द्वारा 'पंजाब केसरी' की प्रिंटिंग प्रेस पर की गई छापेमारी और कानूनी कार्रवाई की राजनीतिक गलियारों और पत्रकारिता जगत में कड़ी आलोचना हो रही है। आलोचकों और विपक्षी नेताओं ने इस कदम को लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करार दिया है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इस कार्रवाई को 'आपातकाल' की याद दिलाने वाली दमनकारी नीति बताया जा रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार अपनी कमियों को उजागर करने वाली निष्पक्ष और निर्भीक आवाज को दबाने के लिए सत्ता का दुरुपयोग कर रही है।
The police action at the Chandigarh-based printing facility has sparked a nationwide debate on the safety of journalists and the autonomy of media houses in Punjab. पत्रकार संगठनों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस की रीढ़ को तोड़ना तानाशाही मानसिकता का परिचय है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार पर यह आरोप लग रहे हैं कि वे दबाव की राजनीति के जरिए मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, सरकार की ओर से इस कार्रवाई को 'नियमों के उल्लंघन' और 'कानूनी प्रक्रिया' का हिस्सा बताया जा रहा है, हालांकि पत्रकारिता जगत में इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। कई वरिष्ठ संपादकों ने एकजुट होकर इस 'सेंसरशिप' के खिलाफ आवाज उठाई है और इसे अभिव्यक्ति की आजादी का हनन माना है।
This escalation is being viewed as a dark chapter for regional journalism, where a leading media house is facing the brunt of state machinery. सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ अब कई संगठन लामबंद हो रहे हैं और राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की जा रही है। प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर छिड़ी इस जंग ने पंजाब की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है, जहाँ सरकार और मीडिया आमने-सामने हैं। निष्पक्ष प्रेस के समर्थकों का कहना है कि आलोचना सहना लोकतंत्र की पहली शर्त है, और बलपूर्वक इसे दबाने के प्रयास हमेशा विफल होते हैं। फिलहाल, पूरे प्रदेश में इस मुद्दे पर भारी रोष व्याप्त है और लोग 'पंजाब केसरी' के समर्थन में उतर आए हैं।