रुपये को थामने के लिए आरबीआई का 'मेगा ऑपरेशन': बाजार में झोंके 9.7 अरब डॉलर, डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड गिरावट से बढ़ी चिंता



नई दिल्ली: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आ रही ऐतिहासिक गिरावट को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मोर्चा संभाल लिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने नवंबर महीने के दौरान विदेशी मुद्रा बाजार में 9.7 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की है। आरबीआई के मासिक बुलेटिन से खुलासा हुआ है कि रुपये की अस्थिरता को कम करने के लिए बैंक ने कुल 24.06 अरब डॉलर बेचे, जबकि 14.35 अरब डॉलर की खरीद की। अक्टूबर में भी 11.88 अरब डॉलर की बिक्री की गई थी, जो यह दर्शाता है कि केंद्रीय बैंक मुद्रा के मूल्य को बचाने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का आक्रामक तरीके से उपयोग कर रहा है। The strategic intervention by the RBI is a direct response to the unprecedented pressure on the South Asian currency amid global economic shifts.

रुपये पर दबाव का मुख्य कारण वैश्विक और घरेलू कारकों का एक जटिल मिश्रण है। नवंबर में रुपया 89.49 के निचले स्तर पर था, जो बुधवार तक और गिरकर 91.74 के रिकॉर्ड ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर बढ़ती 'यील्ड' (Yield) के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय बाजारों से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। इसके अतिरिक्त, धातु आयातकों (Metal Importers) की ओर से डॉलर की भारी मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ता 'रिस्क-ऑफ' माहौल रुपये को कमजोर कर रहा है। जब निवेशक जोखिम से बचते हैं, तो वे उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले 'डॉलर' की ओर रुख करते हैं। The combination of capital flight by FPIs and rising US bond yields has created a perfect storm for the Indian currency.

कमजोर होते रुपये का सीधा असर आम आदमी की रसोई और जेब पर पड़ना तय है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और खाद्य तेल का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा होने से ईंधन (Petrol/Diesel) और आयातित वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे, जिससे महंगाई में उछाल आएगा। इसके अलावा, विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों के लिए ट्यूशन फीस और रहने का खर्च काफी महंगा हो जाएगा। हालांकि, आरबीआई के हस्तक्षेप ने रुपये को और अधिक गिरने से फिलहाल बचा लिया है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए आने वाले महीने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। The sustained depreciation of the rupee poses a significant risk to the country's inflation management and trade deficit.



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