नई दिल्ली: देश में तेजाब हमलों (Acid Attacks) की भयावहता और पीड़िताओं को मिलने वाली सहायता की धीमी रफ्तार पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। एक एसिड अटैक पीड़िता की अपील पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर वर्षवार विस्तृत ब्योरा तलब किया है। अदालत ने सरकारों से पूछा है कि अब तक कितनी घटनाओं में चार्जशीट दाखिल की गई है, कितने मामलों में अंतिम फैसला आ चुका है और कितने केस अदालतों में लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस सक्रियता का उद्देश्य देश में Acid Violence के खिलाफ न्याय प्रणाली को अधिक जवाबदेह और संवेदनशील बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने केवल कानूनी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि पीड़िताओं के सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास पर भी चिंता जताई है। राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रत्येक पीड़िता की शैक्षणिक योग्यता, वैवाहिक स्थिति और वर्तमान उपचार की स्थिति का विवरण प्रस्तुत करें। विशेष रूप से यह जानकारी मांगी गई है कि पीड़िताओं को अब तक कितना मुआवजा दिया गया है और उनके Rehabilitation के लिए प्रशासन ने क्या ठोस कदम उठाए हैं। अदालत ने उन दुर्लभ और दर्दनाक मामलों की भी अलग से सूची मांगी है जिनमें किसी पीड़िता को जबरन तेजाब पिला दिया गया हो। यह व्यापक डेटा एकत्र करने का उद्देश्य भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त नीतिगत बदलाव करना है।
अदालत का मानना है कि आंकड़ों की स्पष्टता होने से ही पीड़ितों को समयबद्ध न्याय सुनिश्चित किया जा सकेगा और उनकी सहायता के लिए जरूरी संसाधन आवंटित किए जा सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आंकड़ों के विश्लेषण के बाद वह पुनर्वास और सुरक्षा के लिए नई गाइडलाइंस भी जारी कर सकता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अदालत के इस कदम का स्वागत करते हुए इसे Legal Support for Survivors की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ बताया है। अब सभी राज्यों को एक निश्चित समय सीमा के भीतर यह विस्तृत शपथ पत्र कोर्ट में जमा करना होगा, जिससे देश में एसिड अटैक पीड़िताओं की वास्तविक स्थिति का खुलासा हो सकेगा।