मॉल प्रोजेक्ट बना मौत का 'तालाब': युवराज मेहता की जान जाने पर NGT का कड़ा रुख, यूपी सरकार और नोएडा अथॉरिटी को थमाया नोटिस


नई नोएडा: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने नोएडा के सेक्टर 150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दुखद मृत्यु के मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और नोएडा अथॉरिटी के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। ट्रिब्यूनल ने यूपी सरकार के प्रधान सचिव (पर्यावरण), नोएडा अथॉरिटी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट सहित सभी संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि पर्यावरण नियमों के पालन में गंभीर लापरवाही और कानून के उल्लंघन का प्रत्यक्ष प्रमाण है। The green tribunal's intervention follows public outrage over the fatal neglect of a construction site that turned into a hazardous water body over the past decade.

एनजीटी की जांच रिपोर्ट के अनुसार, सेक्टर 150 स्थित जिस भूखंड में डूबने से युवराज की मौत हुई, वह मूल रूप से एक निजी मॉल प्रोजेक्ट के लिए आवंटित किया गया था। लगभग दस वर्षों तक प्रोजेक्ट पर काम रुकने और उचित देखरेख न होने के कारण बारिश के पानी और आस-पास की सोसायटियों से निकलने वाले गंदे पानी ने इस गहरे गड्ढे को एक विशाल तालाब का रूप दे दिया था। ट्रिब्यूनल ने माना कि समाचार रिपोर्टों के तथ्य प्रथम दृष्टया पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 का उल्लंघन दर्शाते हैं। यह मामला उजागर करता है कि कैसे एक व्यावसायिक भूखंड प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण स्थानीय निवासियों के लिए जानलेवा जाल बन गया। The conversion of an abandoned urban site into an unregulated stagnant pool highlights systemic failures in land management and environmental safety.

नोएडा के स्थानीय निवासियों ने ट्रिब्यूनल के समक्ष आरोप लगाया है कि नोएडा अथॉरिटी को इस जलजमाव और सुरक्षा की कमी के बारे में बार-बार सूचित किया गया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। निवासियों को डर था कि हिंडन नदी का जलस्तर बढ़ने पर यह पानी वापस सोसायटियों में घुस सकता है और बीमारियां फैला सकता है, लेकिन प्रशासन की चुप्पी ने आखिरकार एक युवा इंजीनियर की बलि ले ली। एनजीटी अब इस बात की जांच कर रही है कि मॉल के मालिक और सरकारी अधिकारियों पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी के लिए क्या कानूनी और वित्तीय दंड लगाया जाना चाहिए। The judicial scrutiny aims to fix accountability on developers and public officials who allowed the hazardous conditions to persist for over ten years.


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