बिलासपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने वैवाहिक विवादों और दहेज प्रताड़ना के मामलों में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पति और उसके परिवार के खिलाफ निराधार आपराधिक शिकायतें दर्ज कराना 'मानसिक क्रूरता' के समान है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने धमतरी परिवार न्यायालय के पुराने फैसले को पलटते हुए पीड़ित पति के पक्ष में फैसला सुनाया और उसे तलाक (Divorce) की मंजूरी दे दी। अदालत ने माना कि वैवाहिक संबंधों में दुर्भावनापूर्ण इरादे से लगाए गए आरोप रिश्ते की नींव को पूरी तरह खत्म कर देते हैं।
यह कानूनी लड़ाई साल 2017 में शुरू हुई थी, जब पत्नी ने अपने पति, सास और जेठ के खिलाफ IPC की धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) के तहत मामला दर्ज कराया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में पूरे परिवार को बरी कर दिया था। इसके बावजूद, पत्नी ने हार नहीं मानी और निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) तक चुनौती दी, लेकिन हर जगह उसके आरोप झूठे पाए गए। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से उल्लेख किया कि बरी होने के बावजूद उच्च अदालतों में अपील दायर कर परिवार को जेल भिजवाने का निरंतर प्रयास करना मानसिक प्रताड़ना की पराकाष्ठा है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि महिला ने न केवल अपने पति बल्कि अपनी वृद्ध सास के खिलाफ भी मानहानिकारक और झूठे आरोप लगाए थे। जस्टिस अग्रवाल ने टिप्पणी की कि किसी निर्दोष व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में घसीटना और उसे जेल भेजने की साजिश रचना वैवाहिक सद्भाव को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है। Hindu Marriage Act के तहत क्रूरता केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी हो सकती है, और यह मामला इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में पति से यह उम्मीद करना कि वह अपनी पत्नी के साथ जीवन व्यतीत करे, अनुचित होगा।
यह फैसला उन मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) साबित होगा जहाँ दहेज विरोधी कानूनों का दुरुपयोग निजी प्रतिशोध के लिए किया जाता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय से Matrimonial Disputes में झूठी शिकायतों पर लगाम लगेगी और निर्दोष परिवारों को राहत मिलेगी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस तर्क को भी खारिज कर दिया जिसमें पति की तलाक की याचिका को पहले नामंजूर कर दिया गया था। अब इस फैसले के बाद पति को वर्षों के मानसिक संताप से कानूनी मुक्ति मिल गई है।