नई दिल्ली/बेंगलुरु: भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) 17 फरवरी 2026 को एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते की नींव रखेंगे। इस दिन दोनों नेता कर्नाटक के वेमगल में स्थित 'टाटा-एयरबस' की H125 Helicopter Assembly Line का वर्चुअल उद्घाटन करेंगे। यह भारत में निजी क्षेत्र की पहली हेलीकॉप्टर निर्माण इकाई होगी, जो 'मेक इन इंडिया' अभियान को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान करेगी। इसी दिन बेंगलुरु में भारत और फ्रांस के बीच छठा वार्षिक रक्षा संवाद भी आयोजित होगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और फ्रांस की रक्षा मंत्री कैथरीन वाउटरिन करेंगी।
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इस संवाद के दौरान अगले 10 वर्षों के लिए रक्षा सहयोग के रोडमैप पर मुहर लगाई जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण घोषणा Hammer Missiles के भारत में संयुक्त निर्माण को लेकर हो सकती है। इसके अलावा, हाल ही में 12 फरवरी को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) द्वारा मंजूर किए गए नए Rafale Fighter Aircraft सौदे की बारीकियों पर भी चर्चा होगी। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले साल 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान राफेल विमानों ने अपनी अचूक मारक क्षमता का लोहा मनवाया था, जिसके बाद वायुसेना के लिए इन विमानों की नई स्क्वाड्रन की जरूरत महसूस की जा रही थी।
दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि 'शक्ति', 'वरुणा' और 'गरुड़' जैसे नियमित सैन्य अभ्यासों ने दोनों सेनाओं के बीच आपसी सामंजस्य को भी बढ़ाया है। नए प्रस्तावों के तहत, अब दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों की एक-दूसरे के मुख्यालयों में क्रॉस-पोस्टिंग की घोषणा भी की जा सकती है। फ्रांस की नई रक्षा मंत्री कैथरीन वाउटरिन की यह पहली भारत यात्रा रक्षा उद्योग में Co-production और तकनीकी हस्तांतरण (Technology Transfer) के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब केवल खरीदार नहीं, बल्कि फ्रांस के सहयोग से रक्षा उपकरणों का निर्माता और निर्यातक बनने की ओर अग्रसर है। राफेल के नए सौदे के साथ-साथ हाई एल्टीट्यूड प्स्यूडो सैटेलाइट (HAPS) की खरीद भी भारतीय वायुसेना की निगरानी क्षमता को कई गुना बढ़ा देगी। 17 फरवरी को होने वाला यह संवाद न केवल द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देगा, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा स्थिरता के लिए भी एक मील का पत्थर साबित होगा।