कांगड़ा/मंडी (हिमाचल प्रदेश): हिमाचल प्रदेश में महाशिवरात्रि महोत्सव की धूम के बीच दो अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं। एक ओर ऐतिहासिक Kathgarh Mahadev Temple में तीन दिवसीय जिला स्तरीय महोत्सव के दूसरे दिन शिव-भक्ति और सांस्कृतिक भव्यता का संगम दिखा, तो दूसरी ओर मंडी के अंतर्राष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव में बैठने के स्थान को लेकर देवी-देवताओं की नाराजगी ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। काठगढ़ में आयोजित कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष RS Bali ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने घोषणा की कि श्रद्धालुओं की श्रद्धा को देखते हुए काठगढ़ महादेव की आरती का अब लाइव प्रसारण किया जाएगा, जिसके लिए पर्यटन विभाग को तीन दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
पर्यटन निगम के अध्यक्ष आरएस बाली ने विधायक मलेंद्र राजन के आग्रह पर काठगढ़ धाम की दिव्य छवियों को पर्यटन विभाग के 10 प्रमुख होटलों में प्रदर्शित करने का भी निर्णय लिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने मंदिर परिसर में 10 लाख रुपये की लागत से High-Mast Lights लगाने और मंदिर सुधार सभा को 1 लाख रुपये की व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने की घोषणा की। विधायक मलेंद्र राजन ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा कांगड़ा को 'पर्यटन राजधानी' घोषित करने के बाद काठगढ़ महादेव और डमटाल जैसे स्थलों को अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर लाने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं।
वहीं, मंडी के अंतर्राष्ट्रीय महाशिवरात्रि महोत्सव में परंपरा और व्यवस्था के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। बालीचौकी क्षेत्र के अधिष्ठाता देव मार्कंडेय ऋषि (Dev Markandeya Rishi) और देव विभूषण ने पड्डल मैदान में जिला प्रशासन द्वारा आवंटित नए स्थान पर बैठने से साफ इनकार कर दिया है। देवताओं ने सर्व देवता समिति और प्रशासन को कड़ी चेतावनी देते हुए 'देववाणी' की है कि यदि उन्हें पिछले 20 वर्षों से निर्धारित पुराने स्थान पर नहीं बैठने दिया गया, तो वे रूठ कर वापस अपने देवालय लौट जाएंगे।
देवताओं की इस नाराजगी के बाद महोत्सव की परंपराओं के निर्वहन के लिए देव मार्कंडेय ऋषि और विभूषण शाम को राजदेवता Madhav Rai के दरबार पहुंचे और देव मिलन किया। देवताओं के पुजारियों का कहना है कि प्रशासन के नए स्थान चयन से देव परंपराओं को ठेस पहुँची है। हालांकि, जिला प्रशासन और सर्व देवता समिति ने आश्वासन दिया है कि सोमवार को बातचीत के माध्यम से इस समस्या का उचित समाधान निकाल लिया जाएगा। मंडी नगर के 500वें स्थापना वर्ष के बीच देवताओं का यह कड़ा रुख प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।