नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न सहकर भारत आए हिंदू शरणार्थियों के हक में एक बड़ी और मानवीय टिप्पणी की है। मजनू का टीला इलाके में रहने वाले इन शरणार्थियों के विस्थापन पर रोक लगाते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत मिलने वाला 'जीवन का अधिकार' केवल नागरिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमापूर्ण जीवन और सिर पर छत का अधिकार भी शामिल है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार और DDA को नोटिस जारी कर पूछा है कि नागरिकता देने के बाद इन परिवारों के पुनर्वास के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
यह मामला दिल्ली के सिग्नेचर ब्रिज के पास स्थित शरणार्थी कैंप का है, जहां लगभग 250-260 हिंदू परिवार पिछले कई वर्षों से रह रहे हैं। इनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति के हैं, जिन्हें पाकिस्तान में 'काफिर' कहकर प्रताड़ित किया गया था। दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) यमुना फ्लडप्लेन को खाली कराने के नाम पर इन झुग्गियों को हटाने की तैयारी में था, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हरी झंडी दे दी थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब इस पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब इन लोगों ने भारत को अपना घर मान लिया है और सरकार ने उन्हें स्वीकार किया है, तो उन्हें बेघर होने के लिए क्यों छोड़ दिया गया?
शरणार्थी कैंप में रहने वाले करीब 1200 लोगों के लिए यह फैसला किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। इन शरणार्थियों का कहना है कि वे भारत केवल इसलिए आए क्योंकि यहाँ उन्हें अपनी आस्था और जीवन की सुरक्षा की उम्मीद थी। पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि सरकार को इन शरणार्थियों के लिए Alternative Housing या पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए। मामले की अगली सुनवाई चार हफ्तों के बाद होगी, तब तक यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह टिप्पणी Citizenship Amendment Act (CAA) के तहत नागरिकता पाने वाले अन्य लोगों के भविष्य के लिए भी एक नजीर साबित होगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति को नागरिकता देने का अर्थ केवल कागजी दस्तावेज देना नहीं, बल्कि उसे समाज की मुख्यधारा में सम्मान के साथ जोड़ना है। शरणार्थी परिवारों ने कोर्ट के इस रुख का स्वागत करते हुए इसे 'न्याय की जीत' बताया है।