पंजाब के रिटायर्ड कर्मचारियों को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने पेंशन पर सुनाया अहम फैसला



चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट (Punjab and Haryana High Court) ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पेंशन अधिकारों से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी जिला बोर्ड के अधीन दी गई सेवा अवधि को केवल इस तकनीकी आधार पर पेंशन लाभ से बाहर नहीं रखा जा सकता कि उस समय कर्मचारी ने कान्ट्रिब्यूटरी प्रोविडेंट फंड (CPF) में अंशदान नहीं किया था। जस्टिस हरकेश मनुजा की एकल पीठ ने पंजाब सरकार की दूसरी अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए निचली दोनों अदालतों के कर्मचारी-हितैषी फैसलों को बरकरार रखा।

क्या है पूरा मामला? हेडमास्टर की पुरानी सेवा जोड़ने पर थी आपत्ति

यह कानूनी विवाद लुधियाना के निवासी हरदयाल सिंह की सेवा अवधि से जुड़ा है। उन्होंने 31 अगस्त 1953 से 30 सितंबर 1957 तक जिला बोर्ड के स्कूलों में अपनी सेवाएं दी थीं। इसके बाद, 1 अक्टूबर 1957 को इन स्कूलों का पंजाब सरकार में विलय (Merger) हो गया और वे पूर्ण रूप से सरकारी कर्मचारी बन गए। 30 जून 1986 को वह सरकारी हाई स्कूल, धर्मपुरा से हेडमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। हालांकि, विभाग द्वारा उनके सेवानिवृत्ति लाभ निर्धारित करते समय जिला बोर्ड वाली सेवा अवधि (1953-1957) को गणना में शामिल नहीं किया गया था।

जिला बोर्ड की इस सेवा को न जोड़ने के कारण हरदयाल सिंह को पेंशन, ग्रेच्युटी (Gratuity), अवकाश नकदीकरण (Earned Leave Encashment), जनरल प्रोविडेंट फंड (GPF) और हेडमास्टर ग्रेड के अन्य वित्तीय लाभों का पूरा भुगतान नहीं मिल पाया था, जिसके खिलाफ उन्होंने कानूनी लड़ाई शुरू की।

सरकार की दलीलें खारिज, हाई कोर्ट ने दिया बिमला देवी केस का हवाला

इस मामले में निचली अदालत (Trial Court) ने 1 अगस्त 1995 को कर्मचारी के पक्ष में फैसला दिया था, जिसे प्रथम अपीलीय अदालत ने भी सही ठहराया था। इसके खिलाफ पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट का रुख किया और दलील दी कि संबंधित अवधि की सेवा पेंशन योग्य नहीं थी। सरकार ने Punjab Educational Service Rules, 1961 के नियम 13(2) का हवाला देते हुए दावा किया कि चूंकि कर्मचारी ने उस दौरान फंड में अंशदान नहीं किया था, इसलिए इस एडहाक सेवा का लाभ नहीं दिया जा सकता।

हाई कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा: विवादित सेवा वर्ष 1953 से 1957 के बीच की है, जबकि सरकार द्वारा संदर्भित नियम वर्ष 1961 में लागू हुए थे, जिन्हें पिछली तारीख से थोंपा नहीं जा सकता।

नियम 13(2) में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो यह कहता हो कि सीपीएफ की सदस्यता न लेने पर पूर्व सेवा को पेंशन के लिए अमान्य माना जाएगा।

कोर्ट ने बिमला देवी बनाम हरियाणा राज्य (Bimla Devi vs State of Haryana) मामले के कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि पेंशन संबंधी लाभ निर्धारित करते समय एडहाक (Ad-hoc) सेवा को भी अनिवार्य रूप से गणना में शामिल किया जाना चाहिए। इसी के साथ अदालत ने पंजाब सरकार की अपील को पूरी तरह निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।


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