भारत में त्योहारों की परंपरा के पीछे गहरे सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण छिपे होते हैं, और बसंत पंचमी इन्हीं में से एक विशेष पर्व है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाए जाने वाले इस त्योहार को 'ऋतुराज' बसंत के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन चारों ओर पीले रंग की छटा बिखरी नजर आती है, क्योंकि यह रंग न केवल प्रकृति में सरसों के खेतों के लहलहाने का प्रतीक है, बल्कि इसे हिंदू धर्म में शुभता, ज्ञान और सात्विकता का कारक भी माना जाता है। Yellow is considered the color of energy and positivity, representing the brilliance of the sun and the mental clarity required for learning, which is why it is dedicated to Goddess Saraswati.
वर्ष 2026 में बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी, शुक्रवार को मनाया जाएगा। यद्यपि पंचमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी की शाम 06:15 बजे से हो जाएगी, लेकिन उदयातिथि की मान्यता के अनुसार मुख्य पूजन और उत्सव 23 जनवरी को ही संपन्न होंगे। इस दिन छात्र और कला जगत से जुड़े लोग विशेष रूप से माता सरस्वती की आराधना करते हैं। It is believed that observing the rituals on this day bestows wisdom and focus, helping individuals excel in their academic and creative pursuits. भक्त पीले वस्त्र धारण कर माता को पीले पुष्प, पीला चंदन और पीले पकवान अर्पित करते हैं, जो उनके अटूट विश्वास और सादगी को दर्शाता है।
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ पीला रंग मनोवैज्ञानिक रूप से भी एकाग्रता बढ़ाने वाला माना गया है। बसंत ऋतु में जब कड़कड़ाती ठंड कम होने लगती है और प्रकृति नया श्रृंगार करती है, तब पीला रंग जीवन में नई उमंग और खुशहाली का संचार करता है। This festival marks a seasonal transition where the blooming yellow flowers and the mild sunlight create an environment of hope and rebirth. प्राचीन काल से ही गुरुओं और शिष्यों के लिए इस दिन का महत्व अत्यधिक रहा है, क्योंकि इसे विद्यारंभ और ज्ञानार्जन के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त माना जाता है।