'बोर्ड ऑफ पीस' पर पाकिस्तान में गृहयुद्ध जैसे हालात: शहबाज शरीफ पर बरसे पूर्व राजनयिक, इजरायल के साथ मंच साझा करने को बताया 'ऐतिहासिक गद्दारी'


इस्लामाबाद/दावोस: स्विट्जरलैंड के दावोस में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) के औपचारिक लॉन्च के बाद पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में एक बड़ा तूफान खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के इस बोर्ड में शामिल होने के फैसले को विपक्षी नेताओं, पूर्व राजनयिकों और बुद्धिजीवियों ने 'फिलिस्तीन के मुद्दे के साथ गद्दारी' और 'अमेरिका की चाटुकारिता' करार दिया है। सबसे तीखा हमला संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने किया है। उन्होंने इस बोर्ड की विश्वसनीयता को शून्य बताते हुए कहा कि पाकिस्तान ने एक ऐसे संगठन का हिस्सा बनने का आत्मघाती फैसला किया है जो केवल ट्रंप के कार्यकाल तक ही सीमित है। लोधी ने सवाल उठाया कि क्या ट्रंप को खुश करना देश के बुनियादी सिद्धांतों से बड़ा हो गया है? The inclusion of Pakistan in a platform alongside Israel has sparked an unprecedented debate over the nation's core diplomatic values.

विरोध के मुख्य बिंदु: क्यों भड़का है पाकिस्तान?

पाकिस्तान में इस फैसले का विरोध मुख्य रूप से तीन स्तरों पर हो रहा है, जिसने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं:

इजरायल के साथ मंच साझा करना: पूर्व राजनयिकों का तर्क है कि पाकिस्तान ने आज तक इजरायल को एक देश के रूप में मान्यता नहीं दी है। ऐसे में जिस बोर्ड में इजरायल और बेंजामिन नेतन्याहू सक्रिय भूमिका में हैं, उसका हिस्सा बनना पाकिस्तान की दशकों पुरानी विदेश नीति का उल्लंघन है।

संसदीय अवहेलना: पूर्व सीनेटर मुस्तफा नवाज खोखर ने इस फैसले को 'अमान्य' करार दिया है। उनका कहना है कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते में शामिल होने से पहले न तो संसद में कोई चर्चा की गई और न ही जनता की राय ली गई।

 ट्रंप की 'बूट पॉलिश' का आरोप: पूर्व कानून मंत्री बाबर अवान ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप को खुश करने के लिए पाकिस्तान उन लोगों के साथ हाथ मिला रहा है जो युद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि 'बोर्ड ऑफ पीस' को संयुक्त राष्ट्र (UN) के विकल्प के रूप में पेश करना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता है। पाकिस्तानी पत्रकार बकीर सज्जाद ने इसे 'मुस्लिम दुनिया का सबसे बड़ा पाखंड' बताते हुए कहा कि यह बोर्ड बेबस फिलिस्तीनियों को न्याय दिलाने के बजाय केवल राजनीतिक चापलूसी का जरिया है। आलोचकों का कहना है कि ट्रंप का यह बोर्ड अंतरराष्ट्रीय कानूनों के बजाय 'समानांतर सत्ता' के रूप में काम करेगा, जिसमें पाकिस्तान जैसे कमजोर आर्थिक स्थिति वाले देश केवल मोहरे की तरह इस्तेमाल होंगे। दावोस से शुरू हुई यह राजनीतिक चिंगारी अब पाकिस्तान की सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों का रूप लेने लगी है, जिससे शहबाज सरकार की स्थिरता पर भी सवाल उठने लगे हैं। The government's defense of 'seeking a seat at the table' has found little resonance among the agitated public and political elite.



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