जालंधर/संगरूर: पंजाब में सरकारी बस सेवा के भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। पनबस और पी.आर.टी.सी. ठेका कर्मचारी यूनियन ने अपनी लंबित मांगों को लेकर भगवंत मान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यूनियन के प्रदेश प्रधान रेशम सिंह गिल ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी कर्मचारियों को अपनी जायज आवाज उठाने का अधिकार नहीं मिल रहा है। उन्होंने संघर्ष कर रहे कर्मचारियों पर झूठे मुकदमे दर्ज करने और उन्हें जेलों में बंद करने की नीति की कड़ी निंदा की। यूनियन नेताओं का दावा है कि सरकार प्राइवेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए विभाग के निजीकरण की दिशा में बढ़ रही है। The Contractual Workers Union of PUNBUS and PRTC has accused the government of promoting Privatization at the cost of public institutions.
यूनियन ने सरकार की 'किलोमीटर स्कीम' (Kilometer Scheme) पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे विभाग के लिए घाटे का सौदा बताया है। महासचिव शमशेर सिंह ढिल्लों ने कहा कि सरकार को किलोमीटर स्कीम के घाटे में होने के पुख्ता प्रमाण दिए जा चुके हैं, फिर भी बार-बार इसके टेंडर जारी किए जा रहे हैं। इसके साथ ही वक्ताओं ने खुलासा किया कि सरकारी बसों में महिलाओं को दी जा रही मुफ्त सफर सुविधा का लगभग 1200 करोड़ रुपया बकाया है, जिसके कारण विभाग कर्मचारियों को वेतन देने तक में असमर्थ हो रहा है। फंड की कमी की वजह से नई बसें खरीदने के लिए बैंक लोन की मंजूरी भी नहीं मिल पा रही है। The staggering 1200 Crore Pending Dues from the free travel scheme have paralyzed the financial health of Punjab's transport department.
मांगों के समाधान के लिए यूनियन ने कड़े संघर्ष की रूपरेखा तैयार की है। इसके तहत 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी डिपो के गेटों पर काले रिबन बांधकर रोष प्रदर्शन किया जाएगा। यदि 28 जनवरी की प्रस्तावित बैठक में हल नहीं निकलता, तो कर्मचारी संगरूर में पक्का धरना शुरू करेंगे। आंदोलन को और तेज करते हुए 9 फरवरी को गेट रैलियां, 11 फरवरी को डिपो में बसें खड़ी कर विरोध और अंततः 12 फरवरी को पूर्ण हड़ताल कर मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने का निर्णय लिया गया है। इस हड़ताल से पंजाब में आम जनता को भारी असुविधा होने की आशंका है। The Full-scale Strike on February 12th is expected to halt the state transport system if the government fails to address the workers' grievances.