तालिबान का नया फरमान: मौलाना-मौलवियों को मिली कानूनी सुरक्षा, चार वर्गों में विभाजित किया गया अफगान समाज



काबुल: अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान प्रशासन ने एक बार फिर अपने कट्टरपंथी और विवादास्पद फैसलों से दुनिया को चौंका दिया है। तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा द्वारा अनुमोदित 'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड फॉर कोर्ट' (Criminal Procedure Code 2026) को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भारी चिंता जताई है। इस नए कोड के तहत तालिबान ने देश में मुल्ला और मौलवियों को कानूनी जांच और मुकदमों से एक प्रकार की सुरक्षा प्रदान की है। रिपोर्टों के अनुसार, यदि कोई धार्मिक गुरु अपराध करता है, तो उस पर सामान्य नागरिकों की तरह केस नहीं चलाया जाएगा, बल्कि उसे केवल 'नसीहत' या 'परामर्श' देकर छोड़ दिया जाएगा। This New Judicial Code effectively places religious scholars above the law, exempting them from standard prosecution and trial procedures.

नए नियमों के 'आर्टिकल 9' ने अफगान समाज को चार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर दिया है, जिसे आलोचक 'चतुर्वर्ण व्यवस्था' या 'मध्यकालीन गुलामी' की वापसी बता रहे हैं। इसमें सबसे ऊपर धार्मिक विद्वान (Ulama) और उच्च पदस्थ लोग हैं, उसके बाद कुलीन वर्ग (बुजुर्ग और व्यापारी), फिर मध्यम वर्ग और सबसे नीचे निचली श्रेणी (गरीब और कमजोर लोग) को रखा गया है। हैरान करने वाली बात यह है कि एक ही अपराध के लिए सजा का पैमाना अलग-अलग वर्गों के लिए अलग होगा। जहाँ उच्च वर्ग को केवल सम्मन या सलाह दी जाएगी, वहीं निचले वर्ग के लोगों को कारावास के साथ शारीरिक दंड और कोड़े मारने की सजा का प्रावधान है। The Social Stratification introduced by the Taliban creates a legal hierarchy where punishment depends on social status rather than the nature of the crime.

इस नए कानून में 'गुलामी' (Ghulami) जैसे शब्दों का भी खुलेआम इस्तेमाल किया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का सीधा उल्लंघन है। 'नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट' सहित कई विपक्षी समूहों और मानवाधिकार संस्थाओं जैसे 'रावदारी' ने इसकी निंदा करते हुए इसे 'बर्बरता का चार्टर' करार दिया है। आलोचकों का कहना है कि यह नियम न केवल अल्पसंख्यकों और महिलाओं के अधिकारों को कुचलता है, बल्कि किसी भी मुस्लिम नागरिक को 'गुनाह' देखने पर व्यक्तिगत रूप से सजा देने का अधिकार भी देता है। तालिबान का यह कदम देश में न्याय व्यवस्था को पूरी तरह से कट्टरपंथी विचारधारा के अधीन करने की कोशिश माना जा रहा है। This Institutionalized Discrimination marks a significant regression in human rights, formalizing a class system that strips away the core principles of equality and justice.



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