UGC रूल्स 2026 पर राजनीतिक घमासान: उदित राज ने जताई 'बड़ी साजिश' की आशंका, कहा विरोध के बावजूद सवर्ण भाजपा को ही देंगे वोट



नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए 'इक्विटी रूल्स 2026' को लेकर देश भर में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच कांग्रेस नेता उदित राज ने एक विवादित बयान दिया है। उदित राज ने इन नियमों और इनके खिलाफ हो रहे सवर्णों के विरोध को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की एक 'बड़ी राजनीतिक साजिश' करार दिया है। उनका दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम से भाजपा को 'डबल फायदा' होने वाला है। उदित राज के अनुसार, एक तरफ नए नियमों से दलित, ओबीसी और आदिवासी वर्ग भाजपा के करीब आएंगे, वहीं दूसरी तरफ सवर्ण वर्ग विरोध के बावजूद अंततः भाजपा को ही अपना समर्थन देगा। The Congress leader's claim suggests that the current unrest is a calculated move to consolidate votes from across the caste spectrum.

उदित राज ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयानों के जरिए यह तर्क दिया कि यूजीसी के नए नियमों का विरोध करने वाले अधिकांश लोग भाजपा और आरएसएस के ही समर्थक हैं। उन्होंने 'चित भी इनका और पट भी इनका' की कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि यह विरोध प्रदर्शन केवल एक दिखावा हो सकता है। उन्होंने वाराणसी में मंदिर तोड़े जाने का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि यदि यह कोई गैर-भाजपा सरकार होती, तो अब तक बहुत बड़ा आंदोलन हो चुका होता। उनका मानना है कि भाजपा अंदरूनी तौर पर ही इस विरोध को हवा दे रही है ताकि राजनीतिक लाभ लिया जा सके। This 'Double Benefit' Theory put forth by the former MP has added a new communal and political dimension to the ongoing educational reforms debate.

यूजीसी रूल्स 2026 का विरोध मुख्य रूप से 'सामान्य श्रेणी' के छात्रों और सवर्ण समाज द्वारा किया जा रहा है, जिनका आरोप है कि ये नियम एकतरफा हैं और इनमें झूठी शिकायतों के खिलाफ किसी सुरक्षा कवच का प्रावधान नहीं है। दूसरी ओर, उदित राज ने यह भी सवाल दागा कि क्या अब दलित और पिछड़ा वर्ग हिंदू नहीं रहा, जो भाजपा केवल एक वर्ग की नाराजगी को मैनेज करने में जुटी है। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या वास्तव में यूजीसी नियमों का यह विवाद आगामी चुनावों के लिए एक बिसात की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। The Political Tussle over UGC's anti-discrimination guidelines is rapidly evolving into a broader debate on identity politics and electoral engineering.



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