बेंगलुरु: भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक और क्रांतिकारी उपलब्धि हासिल कर ली है। भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला और बेंगलुरु स्थित Indian Institute of Science (IISc) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने मिलकर मंगल ग्रह की मिट्टी से ईंट बनाने की एक अनूठी तकनीक विकसित की है। यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल PLOS One में प्रकाशित हुआ है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मंगल ग्रह पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके ही वहां निर्माण कार्य को संभव बनाएगी, जिससे पृथ्वी से भारी निर्माण सामग्री ले जाने की आवश्यकता और करोड़ों डॉलर का खर्च कम हो जाएगा।
इस रिसर्च का नेतृत्व कर रहे शुभांशु शुक्ला, जो हाल ही में International Space Station (ISS) से लौटे हैं, ने बताया कि भविष्य के मंगल मिशनों के लिए लैंडिंग पैड, सड़कें और सुरक्षित आश्रय स्थल बनाने के लिए वहां की मिट्टी (Martian Soil) का उपयोग करना ही सबसे व्यावहारिक समाधान है। वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया में एक विशेष 'बैक्टीरिया' का उपयोग किया है, जो मिट्टी के कणों को आपस में जोड़कर उन्हें पत्थर जैसी मजबूती प्रदान करता है।
इस खोज में 'बायोसीमेंटेशन' (Biocementation) प्रक्रिया का उपयोग किया गया है। वैज्ञानिकों ने बेंगलुरु की मिट्टी से एक अत्यधिक मजबूत बैक्टीरिया खोज निकाला, जो मंगल की मिट्टी में पाए जाने वाले जहरीले केमिकल 'परक्लोरेट' के बावजूद जीवित रह सकता है। जब इन बैक्टीरिया को मंगल जैसी कृत्रिम मिट्टी और पोषक तत्वों के साथ मिलाया गया, तो उन्होंने एक विशेष मैट्रिक्स बनाया जिसने मिट्टी को ठोस ईंट में बदल दिया। ISRO और IISc के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तकनीक न केवल मंगल पर बस्तियां बसाने के काम आएगी, बल्कि पृथ्वी पर भी कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले 'इको-फ्रेंडली' निर्माण का विकल्प बन सकती है।
अब भारतीय वैज्ञानिक इस तकनीक का परीक्षण मंगल जैसे वातावरण और अत्यधिक Carbon Dioxide वाली परिस्थितियों में करने की योजना बना रहे हैं। यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन सकता है जिसके पास दूसरे ग्रहों पर 'सेल्फ-सस्टेनेबल' निर्माण की तकनीक होगी। यह उपलब्धि भारत के आगामी 'मंगलयान-2' (Mangalyaan-2) मिशन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।