नई दिल्ली: दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली परमाणु संपन्न देशों, अमेरिका और रूस के बीच हथियारों के नियंत्रण को लेकर हुआ आखिरी बड़ा समझौता New START Treaty (न्यू स्टार्ट संधि) आज, 5 फरवरी 2026 को समाप्त होने जा रहा है। आधी सदी से भी अधिक समय में यह पहला मौका होगा जब दुनिया की 90% परमाणु शक्ति रखने वाले इन दो देशों पर किसी भी प्रकार का कानूनी प्रतिबंध नहीं रहेगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इसे वैश्विक शांति के लिए एक 'गंभीर क्षण' करार दिया है। इस संधि का अंत होने का अर्थ है कि अब मिसाइलों, तैनात परमाणु हथियारों और भारी बमवर्षकों की संख्या पर लगी कानूनी सीमाएं पूरी तरह हट जाएंगी, जिससे दुनिया एक अनियंत्रित परमाणु होड़ (Nuclear Arms Race) के मुहाने पर खड़ी हो सकती है।
वर्ष 2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव द्वारा हस्ताक्षरित इस संधि ने प्रत्येक देश के लिए तैनात रणनीतिक परमाणु युद्धक हथियारों (Warheads) की संख्या 1,550 तक सीमित कर दी थी। हालांकि, 2023 में यूक्रेन युद्ध के कारण रूस ने इसमें अपनी भागीदारी निलंबित कर दी थी, जिससे आपसी निरीक्षण (Inspections) बंद हो गए थे। अब संधि की समय सीमा पूरी होने पर विशेषज्ञों को डर है कि पारदर्शिता के अभाव में दोनों देश 'वर्स्ट-केस सिनेरियो' (Worst-case Scenario) को आधार मानकर अपने शस्त्रागार को तेजी से बढ़ाना शुरू कर सकते हैं।
संधि की अवधि न बढ़ने का मुख्य कारण इसमें केवल एक बार (5 साल के लिए) विस्तार का प्रावधान होना है, जो 2021 में ही इस्तेमाल हो चुका था। अब इसे जीवित रखने के लिए नए सिरे से अनुसमर्थन की आवश्यकता थी, जिस पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पाई। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सीमाओं का पालन जारी रखने के लिए एक साल के अनौपचारिक समझौते का प्रस्ताव दिया था, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इसे 'बेहतर समझौते' (Better Deal) की शर्त के साथ ठुकरा दिया है। ट्रंप का मानना है कि अब किसी भी नई संधि में चीन की बढ़ती परमाणु शक्ति को शामिल करना अनिवार्य है, जबकि चीन फिलहाल ऐसे किसी भी समझौते से इनकार कर रहा है।
संधि के समाप्त होने से अब दोनों देश अपनी मिसाइलों पर अतिरिक्त वारहेड्स 'अपलोड' करने के लिए स्वतंत्र हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, अमेरिका कुछ ही हफ्तों में अपने बमवर्षकों पर 480 और महीनों के भीतर पनडुब्बियों पर 1,000 अतिरिक्त हथियार तैनात कर सकता है, और रूस भी ऐसी ही क्षमता रखता है। यह स्थिति न केवल द्विपक्षीय तनाव को बढ़ाएगी बल्कि वैश्विक Non-Proliferation Treaty (NPT) के ढांचे को भी कमजोर कर सकती है, जिससे अन्य देश भी परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में प्रेरित हो सकते हैं।