नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। इस संकट के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) के आयात के लिए समुद्री रास्तों को बदल दिया है। एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी (S&P Global Energy) की नवीनतम शोध रिपोर्ट के अनुसार, भारत फारस की खाड़ी में बढ़ते जोखिमों से बचने के लिए अपने तेल-गैस जहाजों को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान के वैकल्पिक रास्तों पर मोड़ रहा है। हालांकि, ईरान ने भी चेतावनी दी है कि यदि उसके स्वयं के तेल निर्यात को रोका गया, तो वह फुजैरा पाइपलाइन और सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन जैसे वैकल्पिक मार्गों को भी निशाना बना सकता है।
शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले एलएनजी टैंकरों की संख्या में भारी गिरावट आई है। जून के अंत में जहां प्रतिदिन औसतन 0.8 कार्गो गुजर रहे थे, वहीं 15 जुलाई 2026 तक यह घटकर महज 0.2 कार्गो प्रति दिन रह गया है। 7 जुलाई को कतर एनर्जी के एक एलएनजी पोत 'अल रेकाय्यात' पर हुए सीधे हमले के बाद वैश्विक जहाज मालिकों में दहशत का माहौल है। रिसर्चर मेहरून एतेबारी का कहना है कि वर्तमान मंदी का कारण उत्पादन में कमी नहीं, बल्कि नौवहन संबंधी गंभीर बाधाएं हैं। कतर एनर्जी एलएनजी और यूएई की एडनॉक एलएनजी (ADNOC LNG) में उत्पादन और लोडिंग तो सामान्य गति से चल रही है, लेकिन बाहरी शिपिंग ठप होने के कारण फारस की खाड़ी में टैंकरों में भारी मात्रा में एलएनजी का भंडार जमा होता जा रहा है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि अकेले कतर के सात लदे हुए जहाजों में लगभग 0.57 मिलियन मीट्रिक टन एलएनजी फंसी हुई है, जबकि पूरी फारस की खाड़ी में 1.9 मिलियन मीट्रिक टन एलएनजी टैंकर क्षमता रुकी पड़ी है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि यदि आने वाले हफ्तों में होर्मुज जलडमरूमध्य की प्रभावी नाकाबंदी में ढील दी जाती है, तो निर्यात में अचानक तेजी आएगी और वैश्विक आपूर्ति सामान्य हो जाएगी। तब तक भारत Alternative Routes के जरिए अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।