वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी योजना 'गाजा बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहली बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों ने इस बोर्ड में शामिल होने के न्योते को ठुकराने के संकेत दिए हैं। दरअसल, ट्रंप इस निकाय को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं, जिस पर फ्रांस ने कड़ा ऐतराज जताया है। फ्रांस का मानना है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के ढांचे और अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी कर सकता है। जवाबी कार्रवाई में ट्रंप ने फ्रांस को चेतावनी दी है कि यदि वे शामिल नहीं होते हैं, तो फ्रांसीसी वाइन और शैंपेन पर 200 प्रतिशत का भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया जाएगा।
ट्रंप की इस योजना के तहत बोर्ड का उद्देश्य गाजा में स्थायी शांति बहाल करना और उसके पुनर्निर्माण की निगरानी करना है। हालांकि, इस बोर्ड की सदस्यता के नियम और शर्तें विवादों में हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, बोर्ड में स्थायी सीट हासिल करने के लिए देशों को 1 बिलियन डॉलर (करीब 8300 करोड़ रुपये) की भारी-भरकम फीस चुकानी होगी। अब तक केवल हंगरी और वियतनाम जैसे कुछ देशों ने ही इसमें शामिल होने की पुष्टि की है, जबकि पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की और जॉर्डन सहित करीब 60 देशों को निमंत्रण भेजा गया है। गुरुवार को दावोस में होने वाले विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान ट्रंप इस पर औपचारिक हस्ताक्षर की उम्मीद कर रहे हैं।
भारत के लिए यह एक जटिल कूटनीतिक चुनौती बन गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस 'साहसिक नए दृष्टिकोण' का हिस्सा बनने का न्योता दिया है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, भारत फिलहाल इस प्रस्ताव का गहराई से अध्ययन कर रहा है और अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। भारत की पारंपरिक नीति हमेशा से संयुक्त राष्ट्र के बहुपक्षीय ढांचे और फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने की रही है। ऐसे में इस अमेरिकी प्रभुत्व वाले बोर्ड में शामिल होना भारत की वैश्विक साख और अरब देशों के साथ संबंधों को प्रभावित कर सकता है। जानकार मान रहे हैं कि भारत अगले कुछ दिनों में अपनी रणनीति स्पष्ट करेगा, जिसमें मानवीय सहायता पर जोर देते हुए औपचारिक सदस्यता पर दूरी बनाए रखने का विकल्प भी शामिल हो सकता है।