भारत-चीन व्यापार का नया रिकॉर्ड: क्या 'मदर' और 'फादर' ऑफ ऑल डील्स के बाद अब चीन के साथ होगा महा-समझौता?



नई दिल्ली: भारतीय विदेश व्यापार के लिए साल 2026 ऐतिहासिक बदलावों का गवाह बन रहा है। जहां एक ओर 27 जनवरी को यूरोपीय संघ (EU) के साथ 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (Mother of All Deals) पर हस्ताक्षर हुए, वहीं 3 फरवरी को अमेरिका के साथ 'फादर ऑफ ऑल डील' (Father of All Deal) के तहत टैरिफ 50% से घटकर 18% रह गया। इन बड़ी कूटनीतिक जीत के बीच, अब दुनिया की नजरें चीन पर टिकी हैं। हाल ही में चीनी राजदूत जू फेइहोंग ने खुलासा किया कि साल 2025 में भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार $155.6 Billion के सर्वकालिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12% अधिक है। यह वृद्धि तब हुई है जब दोनों देशों के बीच 2024 के अंत में एलओसी (LAC) पर सैन्य गतिरोध समाप्त हुआ और अगस्त 2025 में तियानजिन में पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच सफल मुलाकात हुई।

हालांकि, इस रिकॉर्ड व्यापार के पीछे एक चिंताजनक सच भी छिपा है 'व्यापार घाटा' (Trade Deficit)। साल 2025 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड $116 Billion तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि भारत चीन से जितना सामान खरीद रहा है, उसके मुकाबले निर्यात बहुत कम (मात्र $19.75 बिलियन) है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत को चीन के साथ 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' (FTA) करना चाहिए? विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईयू के साथ सौदों में गेंद भारत के पाले में थी क्योंकि वहां हमारा निर्यात अधिक है, लेकिन चीन के मामले में स्थिति बिल्कुल उलट है।

यदि भारत और चीन के बीच फ्री ट्रेड डील होती है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। चीनी राजदूत का कहना है कि चीन केवल 'दुनिया का कारखाना' नहीं बल्कि 'दुनिया का बाजार' भी बनना चाहता है और भारतीय कंपनियों को China International Import Expo जैसे मंचों का लाभ उठाना चाहिए। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह चीन के बाजारों में उर्वरक, रेयर अर्थ और टनल बोरिंग मशीनरी जैसे क्षेत्रों में अधिक पहुंच बनाए। अक्टूबर 2024 में सीमा विवाद सुलझने के बाद से सीधी उड़ानें शुरू होना और कैलाश मानसरोवर यात्रा का फिर से बहाल होना संबंधों में सुधार के सकारात्मक संकेत हैं।

भारत सरकार की रणनीति फिलहाल 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' (Make in India) के जरिए अपनी विनिर्माण क्षमता बढ़ाने पर टिकी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी स्पष्ट किया है कि कच्चे माल के आयात को संतुलित करते हुए घरेलू उत्पादन को गति देना ही व्यापार घाटे को कम करने का एकमात्र रास्ता है। चीन के साथ कोई भी भविष्य का समझौता तभी संभव होगा जब भारत अपनी शर्तों पर चीन को बाजार खोलने के लिए मजबूर कर सके।



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